Thursday, 31 December 2015

डोडीताल ट्रैक् - भाग 1 - आयोजन और पहला दिन (दिल्ली से देहरादून)

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दिल्ली से देहरादून

डोडीताल, पता नहीं क्यों ये नाम हमेशा ही मुझे अपनी ओर आकर्षित करता था। जनवरी में जब चोपता - तुंगनाथ का बर्फीला ट्रैक किया था तो बर्फ से त्रिप्ती सी हो गयी थी, तभी सोच लिया था कि अगली बार ऐसा ट्रैक् करना है, जहाँ बर्फ की बजाय प्राकृतिक सुन्दरता हो, जंगल हो, जानवर हों, पक्षी हों, जहाँ आराम से जमीन पर बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता को निहार सकूँ, नर्म हरी घास पे लेट सकूँ, ये सब बर्फ वाले ट्रैक पर सम्भव नहीं था। डोडीताल बहुत समय से मन में था लेकिन कभी जाना नहीं हो पाया, ज्यादा दिमाग नहीं दौड़ाना पड़ा और डोडीताल फाइनल हो गया। अब छुट्टियां तलाशनी शुरू कर दी, मैं जब भी ट्रैक की प्लानिंग करता हूँ तो शुक्रवार रात को दिल्ली से निकलने की सोचता हूँ, जिससे शनिवार और रविवार का अच्छा उपयोग हो जाये, और किस्मत से अगर सोमवार या मंगलवार की कोई सरकारी छुट्टी भी हो तो फिर तो सोने पे सुहागा।



Monday, 28 December 2015

बर्फ के ट्रेक (स्नो ट्रैक) की तैयारी और सावधानियां

एक हिमालय प्रेमी होने के नाते मैं हिमालय को हमेशा इज़्ज़त की नजर से देखता हूँ। मुझे कई मित्र फेसबुक पर या व्हाटस एप्प पर पूछते रहते हैं कि, हम इस बार बर्फ के ट्रैक् पर जा रहे हैं, हमको क्या क्या सामान लेना चाहिए ? जूते कौन से लूँ ? टेण्ट बर्फ में लगाना चाहिए या नहीं आदि। मुझे वो समय याद करके आज भी हंसी आती है, जब पहली बार बर्फ में ट्रैकिंग करने जाना था, इंटरनेट पर जो भी पढ़ता वैसी शौपिंग कर लेता। बाद में वो शौपिंग किसी  काम नहीं आई। और कुल शौपिंग का ख़र्चा ट्रैक के खर्चे से 4 गुना ज्यादा हो गया। इसलिए जो कुछ भी तैयारी की जाए, सोच समझकर करी जाए तो ज्यादा सही रहता है। 

Saturday, 26 December 2015

तुंगनाथ (स्नो ट्रैक) - भाग 5 - तुंगनाथ से वापसी (अन्तिम भाग )

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तुंगनाथ से वापसी

साल के इस समय तुंगनाथ को देखना वाकई में एक अदभुत अनुभव था, मंदिर परिसर पूरी बर्फ की आगोश में समाया होता है, कुछ दुकाने और घर बने हैं, सभी पूरी तरह बर्फ में दबे हुये थे, सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही नजर आ रहा था, पूरा क्षेत्र ही सुनसान पड़ा था सिर्फ हम ही थे जो पिछले 2 महीने में यहाँ पहुंचे थे। एक चील ने हमारे ऊपर मंडराना शूरू कर दिया था, उसको भी नीचे जमीन पर काफी समय बाद हलचल दिखी तो सोचा होगा शिकार मिल गया। करीब 30 मिनट तक हमारे ऊपर चारों और मंडराती रही। इस समय तुंगनाथ से आस पास के नज़ारे बहुत ही शानदार दिख रहे थे, ऊपर चंद्रशिला की और देखा तो ऐसा सा लग रहा था जैसे एक सफ़ेद गुम्बद हो। सभी फ़ोटो सेशन में ब्यस्त थे, मैंने मजाक में गोविन्द को कहा कि तू सबसे आगे-आगे चलता आया है, मैं भी ट्राय करता हूँ कि फ़ुटमार्क कैसे बनाते हैं ? थोडा सा अलग में एक खम्बा पकड़ के पांव डाला तो ये हाल हो गया.......


Thursday, 24 December 2015

तुंगनाथ (स्नो ट्रैक) - भाग 4 - चोपता से तुंगनाथ

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चोपता से तुंगनाथ 

भरत ने रात को ही पूरे ग्रुप को बता दिया था कि सुबह जल्दी निकलना है। इसका कारण ये था कि जैसे जैसे धूप तेज होती जाती है, ताजी गिरी बर्फ पिघलना शुरू हो जाती है, जिससे बर्फ पर फिसलने का खतरा ज्यादा हो जाता है। असल में नीचे की पर्त तो जम जाती है, लेकिन ऊपर की पर्त और ताज़ी गिरी भुरभुरी बर्फ पिघलती है, जिससे ठोस बर्फ पर चलना बहुत मुश्क़िल हो जाता है। क्रेम्पोंन का प्रयोग करना पड़ता है, जो हमारे पास थे नहीं। सुबह 5 बजे अँधेरे में उठ गए, नित्यकर्म से निवृत होना भी बर्फ में एक जंग लड़ना ही है, जो करो बर्फ के पिघले पानी के साथ - साथ उसमें तैरते बर्फ के टुकड़ों के साथ करो। 6 बजे तक तैयार होकर निकलने की तैयारी शुरू कर दी। ग्रुप के 2 सदस्यों ने आगे जाने से मना कर दिया, वो होटल में ही रुक गए। धूप भी अभी नहीं निकली थी, ठण्ड से बुरा हाल था। एक बैग में करीब 10 गर्म पानी की बोतल रखवा ली, क्योंकि पानी अब कहीं नहीं मिलने वाला था। मैने अपनी एक बोतल जैकेट के अंदर वाली जेब में रख ली। हल्का सा नाश्ता किया और निकल पड़े। सभी को साथ चलने की सलाह मिली थी क्योंकि पौ फटने के समय जंगली जानवर अक्सर मिल जाते हैं। 




Monday, 21 December 2015

तुंगनाथ (स्नो ट्रैक) - भाग 3 - देवरिया ताल से चोपता

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देवरिया ताल से चोपता 

आधी रात से जो बर्फ गिरनी शुरू हुयी वो सुबह 4 बजे तक गिरती रही। ठण्ड से बुरा हाल था, स्लीपिंग बैग भी ठण्ड को रोक नहीं पाया, जिस करवट लेटो नीचे से ठण्ड, फिर दूसरी करवट हो जाओ, बस पूरी रात इसी प्रार्थना में कटी कि जल्दी सुबह हो जाए। सुबह जैसे ही हल्का सा उजाला हुआ तो टेण्ट से बाहर झाँका, बाहर का नजारा देख कर आश्चर्यचकित हो गया। कल रात को देवरिया ताल के कुछ ही हिस्से में बर्फ थी, लेकिन अब तो पूरा नजारा ही बदला हुआ था। ऐसा लग रहा था कि रात को किसी और जगह में सोए और सुबह उठे तो कहीं और पहुँच गए, रात की बर्फ़बारी से पूरा देवरिया ताल बर्फ की सफ़ेद चादर से ढक गया। सामने चौखम्भा पर बादल छाये थे तो चौखम्भा दिख नहीं रहा था, अन्यथा देवरिया ताल से चौखम्भा को देखना एक अदभुत अनुभव है।



तुंगनाथ (स्नो ट्रैक) - भाग 2 - सोढ़ी गांव से देवरिया ताल

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सोढ़ी गांव से देवरिया ताल
सुबह नौ बजे सोकर उठे। आज मुझे शाम तक देवरिया ताल पहुंचना था। भरत से सीधे वहीँ मुलाकात होनी थी। बाहर रिमझिम बारिश लगातार रात से ही हो रही थी। दूर चोपता तुंगनाथ की पहाड़ियों पर ताज़ी पड़ी बर्फ दिख रही थी। करीब ग्यारह बजे बारिश रुक गयी, लेकिन मौसम ख़राब ही बना हुआ था। ऊपर गांव में जाकर सभी से मुलाकात की, लंच भी छोटे साले साहब के घर पर ऊपर गांव में ही बना था। सबसे मिलकर और खाना खाकर करीब एक बजे विदा ले ली, और गुप्तकाशी जा रही बस में बैठ गया। मुझे उखीमठ जाना था इसलिए कुण्ड में उतर गया। कुण्ड से बायीं और गुप्तकाशी - केदारनाथ के लिए सड़क चली जाती है, और दाहिने हाथ वाली सड़क उखीमठ होते हुए गोपेश्वर के लिए जाती है। मुझे इसी पर जाना था। काफी देर तक कुण्ड में खड़ा रहा कोई बस या जीप नहीं मिली, तभी एक ट्रक ऊपर की और जाता दिखा, हाथ दिया तो रुक गया, पूछा उखीमठ छोड़ दोगे ? तो उसने बिठा लिया, कुण्ड से उखीमठ 6 कि.मी. दूर है। ट्रक की सवारी का भी अपना ही मजा है।


Saturday, 19 December 2015

देवरिया ताल, चोपता - तुंगनाथ (स्नो ट्रैक) - भाग 1

बात जनवरी महीने की है, ट्रैकिंग का कीड़ा बहुत जोरों से काट रहा था। सर्दियों में अमूमन हिमालय के निचले पहाड़ भी बर्फ से लद जाते हैं। 2500 मीटर की ऊंचाई पर भी अच्छी खासी बर्फ गिर जाती है। जो ज्यादा ही खुराफाती ट्रेकर होते हैं, वही हिमालय में 4000 मीटर या उससे ऊँची जगहों पर जाने की हिम्मत करते हैं। खूब दिमाग दौड़ाया कि इस भयंकर सर्दी में कहाँ ट्रेक पर जाऊँ क्योंकि ट्रैकिंग सीजन कब का ख़त्म हो चूका था। अभी तो जहाँ देखो वहां 5-6 फ़ीट से ज्यादा बर्फ गिरी पड़ी है। फिर बर्फ में अकेले ट्रैक किया नहीं जा सकता, खाना, पीना, रहना सब खुद करना पड़ता है। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाए। आखिरी में अपने बचपन के दोस्त भरत कठैत को अपनी समस्या बताई तो उसने कहा मैं देवरिया ताल चोपता - तुंगनाथ जा रहा हूँ, साथ चलना है तो आ जा। बस सोचना भी क्या था तुरन्त हाँ बोल दिया। भरत टूरिस्ट गाइड है, और वो एक ग्रुप को यहाँ ट्रैकिंग पर ले जा रहा था। तारीख तय हो गई कि 26 तारीख को मैं सीधे देवरिया ताल में मिलूँगा।